रेप वीडियो, इमेजेज तथा चाइल्ड पोर्नोग्राफी को फैलने से रोकने के लिए केंद्र सरकार तथा इंटरनेट इंटरमीडियरीज द्वारा उठाए गए कदमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट मांगी हैं। इसे लेकर छह सप्ताह की समयसीमा सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने दि हैं तथा 3 नवंबर को इस मामले की अगली सुनवाई हो सकती हैं।
दो जजों की बेंच ने यह निर्देश दिया हैं तथा एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी सुनवाई में सरकार की तरफ से मौजूद थी। इंटरनेट इंटरमीडियरीज तथा सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने रेप के वीडियो, इमेजेज तथा चाइल्ड पोर्नोग्राफी के फैलने पर रोक लगाने के लिए सवाल उठाया हैं तथा इसकी रिपोर्ट भी मांगी हैं। इस बारे में जस्टिस बी आर गवई तथा सी टी रविकुमार की बेंच को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने आश्वासन दिया हैं कि स्टेटस रिपोर्ट तैयार हैं। स्टेटस रिपोर्ट सर्विस प्रोवाइडर्स से भी दाखिल करने को बेंच ने कहा हैं तथा भाटी ने बताया हैं कि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड तथा इंटरमीडियरी गाइडलाइंस) रल्स को नोटिफाई कर दिया गया हैं।
इंटरनेट पर आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तक़रीबन चार वर्ष पहले परेशानी जताई थी तथा कोर्ट ने बताया था कि गाइडलाइंस या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर सरकार ऐसे फोटो तथा वीडियो को हटाने के लिए बना सकती हैं। आपत्तिजनक मैटीरियल, रेप तथा चाइल्ड पोर्नोग्राफी को हटाने की आवश्यकता पर केंद्र सरकार तथा Google, Facebook तथा Microsoft जैसी बड़ी इंटरनेट कंपनियों ने सहमति जताई थी।
हाल ही में मिनिस्ट्री ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (Meity) से सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों में एकतरफा तरीके से इंटरनेट को बंद किए जाने पर जवाब देने को कहा था। कोर्ट ने इस बारे में दायर एक जनहित याचिका पर मिनिस्ट्री से सुनवाई के दौरान इसकी वजह पूछी थी। बिना स्पष्ट कारण बताए इंटरनेट सर्विसेज को बंद करना गैर क़ानूनी हैं ऐसा एक फैसले में लगभग दो वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने बताया था। ऐसे क्षेत्रों में इंटरनेट को कुछ राज्य सरकारें बंद कर देती हैं जहां नियमित तौर पर परीक्षाएं चल रही होती हैं। परीक्षाओं में धोखाधड़ी को रोकना इसकी वजह होती हैं तथा याचिका में आरोप लगाया गया था कि इंटरनेट सर्विसेज को पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान तथा गुजरात जैसे राज्यों में बंद कर दिया जाता हैं। केंद्र सरकार से कोर्ट ने पूछा हैं कि क्या कोई भी प्रोटोकॉल इस समस्या से निपटने के लिए उपलब्ध हैं। कोर्ट का मानना था कि वह मिनिस्ट्री को इस मामले में इंटरनेट सर्विसेज बंद करने वाले राज्यों के बजाय नोटिस जारी कर रहा हैं।






